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कला वो चैतन्य है जो मनुष्य के DNA में ब्रह्मांडीय सहअस्तित्व और विविध स्वरूप के जीवन मूल्यों की नक्काशी करती है ! - मंजुल भारद्वाज
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ज़िंदा रहने के लिए कोई कहां तक लड़े, हाकिमों ने हवा, पानी, जमीन, आसमां में जहर फैला कर आग लगा दी हैं। - मंजुल भारद्वाज
ज़िंदा रहने के लिए कोई कहां तक लड़े, हाकिमों ने हवा, पानी, जमीन, आसमां में जहर फैला कर आग लगा दी हैं। - मंजुल भारद्वाज
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“मनुष्य में आत्मबल और आत्महीनता का भाव होता है. आत्मबल से विचार उपजता है और आत्महीनता विकारों को जन्म देती हैं. सदविचार निर्माण करते हैं और विकार विध्वंस ! व्यक्ति जब आत्महीन प्रवृति से ग्रस्त हो जाए तो वो पूरे समाज को विकारों से भर देता है. विचारों के सामने जब विकार विकराल होता है तब समाज विघटित होता है और संस्कृति कलंकित !" - मंजुल भारद्वाज
“मनुष्य में आत्मबल और आत्महीनता का भाव होता है. आत्मबल से विचार उपजता है और आत्महीनता विकारों को जन्म देती हैं. सदविचार निर्माण करते हैं और विकार विध्वंस ! व्यक्ति जब आत्महीन प्रवृति से ग्रस्त हो जाए तो वो पूरे समाज को विकारों से भर देता है. विचारों के सामने जब विकार विकराल होता है तब समाज विघटित होता है और संस्कृति कलंकित !" - मंजुल भारद्वाज
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गिरगिटों की रंगनुमाइश को मुख्यधारा कहना रंगकर्म की अल्प समझ है.रंगकर्मियों को इससे उपर उठने की ज़रूरत है.मुद्दा जन सरोकारों के जुनून और समर्पण का है! - मंजुलभारद्वाज
गिरगिटों की रंगनुमाइश को मुख्यधारा कहना रंगकर्म की अल्प समझ है.रंगकर्मियों को इससे उपर उठने की ज़रूरत है.मुद्दा जन सरोकारों के जुनून और समर्पण का है! - मंजुलभारद्वाज
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" थियेटर मानवीय विचारों, भावनाओं, अनुभवों और उनके उद्देश्यों की प्रस्तुति (अभिव्यक्ति) है" - मंजुल भारद्वाज
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नाटक का उद्देश्य जीवन को ड्रामे के आइने में प्रतिबिम्बित कर दर्शक की चेतना को रचनात्मकता के लिए उत्प्रेरित करना है ! - मंजुल भारद्वाज
नाटक का उद्देश्य जीवन को ड्रामे के आइने में प्रतिबिम्बित कर दर्शक की चेतना को रचनात्मकता के लिए उत्प्रेरित करना है ! - मंजुल भारद्वाज
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व्यवहारिकता के निर्मम यथार्थ को समय के समंदर की छाती पर तोड़ते हुए .. प्रमाणित करते हुए... - मंजुल भारद्वाज
व्यवहारिकता के निर्मम यथार्थ को समय के समंदर की छाती पर तोड़ते हुए .. प्रमाणित करते हुए... - मंजुल भारद्वाज
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मानवीय विष को .. विष के प्रभाव को निष्क्रिय करने की क्षमता .. केवल और केवल कला में है .. यही कला का मकसद और यही कला का साध्य है .... मंजुल भारद्वाज
मानवीय विष को .. विष के प्रभाव को निष्क्रिय करने की क्षमता .. केवल और केवल कला में है .. यही कला का मकसद और यही कला का साध्य है .... मंजुल भारद्वाज
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'हम समाज में थिएटर के प्रभाव का गुणगान करते हैं। लेकिन रंगकर्म (थिएटर) में हमारी प्रत्यक्ष भागीदारी नगणय है। दर्शक होने के नाते नाटक के मंचन या प्रस्तुति का हम पर गहरा असर पड़ता है। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से नाटक (थिएटर) में भागीदारी से हमारे व्यक्तित्व, विचार और मूल्यों में परिवर्तन होता है।' - मंजुल भारद्वाज
'हम समाज में थिएटर के प्रभाव का गुणगान करते हैं। लेकिन रंगकर्म (थिएटर) में हमारी प्रत्यक्ष भागीदारी नगणय है। दर्शक होने के नाते नाटक के मंचन या प्रस्तुति का हम पर गहरा असर पड़ता है। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से नाटक (थिएटर) में भागीदारी से हमारे व्यक्तित्व, विचार और मूल्यों में परिवर्तन होता है।' - मंजुल भारद्वाज
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मेरा दायित्व आपको एक ऐसे छोर (मोड़) पर ले जाना है जहाँ से आप अपना छोर स्वयं ढूंढ लें ! - मंजुल भारद्वाज
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