“सत्ता पोषित रंगमंच, संसाधन सम्पत्र रंगकर्म कभी सरोकारों की बात नहीं करता, वो मुख्यधारा का रंगकर्म नहीं होता .. हाँ सत्ता उसका ढिंढोरा ज़रूर पीटती है.. पर भारत में मुख्यधारा का रंगमंच, वही है जो देश के सुदूर शहरों, कस्बों और गांवों का रंगमंच है, जो संसाधन विहीनता के बावजूद अपने जुनून, उत्साह और सामाजिक-राजनीतिक दायित्वबोध से संचालित होता है।” - मंजुल भारद्वाज
“सत्ता पोषित रंगमंच, संसाधन सम्पत्र रंगकर्म कभी सरोकारों की बात नहीं करता, वो मुख्यधारा का रंगकर्म नहीं होता .. हाँ सत्ता उसका ढिंढोरा ज़रूर पीटती है.. पर भारत में मुख्यधारा का रंगमंच, वही है जो देश के सुदूर शहरों, कस्बों और गांवों का रंगमंच है, जो संसाधन विहीनता के बावजूद अपने जुनून, उत्साह और सामाजिक-राजनीतिक दायित्वबोध से संचालित होता है।” - मंजुल भारद्वाज